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मंगलवार, 23 अगस्त 2011

सैन्धव-सभ्यता के संस्थापक श्रीकृष्ण थे


       आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार भारतीय इतिहास का प्रारम्भ आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले सैन्धव-घाटी सभ्यता की स्थापना से हुआ था। लेकिन, पौराणिक-इतिहास के अनुसार भारतीय इतिहास इतना प्राचीन है कि इसे सनातन भी कहा जा सकता है। आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले तो कलियुग का आरम्भ हुआ था-- यदैव भगवान्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज। वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः।।(विष्णु-पुराण, 4/24/108)।। कलियुग से पूर्व द्वापर युग था। श्रीकृष्ण और कौरव-पाण्डव आदि द्वापर-कलि के सन्धिकाल के लोग थे। द्वापर से पूर्व त्रेता-काल था और उससे पूर्व सत्युग था। चार युगों की चौकड़ी को चतुर्युग कहा जाता है-कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम (विष्णु पुराण, 1/3/15)। ऐसे इकहत्तर चतुर्युगों का एक मनव्तर होता है—चतुर्युगाणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः (वि.पु.,1/3/18)। वर्तमान मनवन्तर का नाम वैवस्वत मन्वन्तर है। इस मन्वतर के सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं। अट्ठाईसवाँ चतुर्युग चल रहा है। इस चतुर्युग के तीन युग भी बीत चुके हैं और यह कलियुग चल रहा है। अतः यह कह देना कि भारतीय इतिहास का प्रारम्भ सैन्धव घाटी सभ्यता से हुआ, षड़यन्त्रपूर्वक रचित विकृति है।
      सैन्धव-घाटी सभ्यता की अपनी वास्तविकता है। इसकी स्थापना भगवान श्रीकृष्ण के काल में हुई थी, इसलिए पाँच हजार वर्ष से अधिक पुरानी सभ्यता है। 1922 ईस्वी में हड़प्पा-आदि स्थलों का पुरातात्विक उत्खनन् किया गया था जिससे अनेक पुरातात्विक प्रमाण मिले।
       विदित हो कि यह विदेशी दासता का काल था। 1857 ईस्वी में महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, वीर कुँअर सिंह, मंगल पाँडे सरीखे राजघराने से लेकर अंग्रेजी सेना के सिपाहियों तक ने मिलकर राष्ट्रीय एकता का परचम लहराते हुए प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का युद्ध लड़ा था। भविष्य में ऐसी राष्ट्रीय एकता कभी न बन पाये, इस दृष्टि से अंग्रेजी-सत्ता ने भारतीय संस्कृति और इतिहास को विकृत करने का कार्य अंग्रेजी-सत्ता सम्पोषित इतिहासकारों को दिया।
      इन इतिहासकारों ने उत्खनन् से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाणों की वास्तविक व्याख्या इस प्रकार है—
1.  सोलह की संख्या का सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण से
      उत्खनन् से प्राप्त प्रमाणों से ज्ञात हुआ कि इस सभ्यता के लोगों ने 16 की संख्या को इकाई निर्धारण का आधार बना रखा था। 16 आनों का एक रूपया, 16 छटाँक का एक सेर आदि। सोलह की संख्या का यह आधार पिछले पाँच हजार साल से आजादी के बाद भी तबतक चलता रहा जब तक कि भारत की सरकार ने दशमलव-पद्धति नहीं लागू की।
       प्रश्न यह है कि लोगों ने 'सोलह' की संख्या को ऐसा महत्व क्यों दिया? भारतीय इतिहास की वास्तविकता को विकृत करने के लिये ये इतिहासकार इस विन्दु को गोल कर गये हैं। हम इस प्रश्न को पुनः खड़ा करते हैं।
      सोलह की संख्या का सम्बन्ध सीधे-सीधे भगवान श्रीकृष्ण से है। उनका जन्म चन्द्रवंश में हुआ था। कालयवन को अपना परिचय देते हुए श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुकुल में वसुदेवजी के पुत्ररूप से उत्पन्न हुए हैं—वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः। विदित हो कि महाराज यदु चन्द्रवंशी थे।
      वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु आदि उत्पन्न सन्तान-परम्परा को सूर्यवंश कहा जाता है, जबकि वैवस्वत मनु की पुत्री इला से उत्पन्न सन्तति-परम्परा को चन्द्रवंश कहा जाता है। इला का विवाह चन्द्रमा के पुत्र बुध से हुआ था जिससे पुरुरवा का जन्म हुआ। इसलिए यह राजवंश चन्द्रवंशी कहलाया।
      भगवान श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी थे। उन्हें पूर्ण-ब्रह्म का अवतार माना जाता है। चन्द्रमा की सोलह कलाएँ होती हैं, इसलिए कहा जाता है कि श्रीकृष्ण सोलहों कलाओं से पूर्ण थे। इस आधार पर सोलह की संख्या को महत्ता मिली। इससे प्रमाणित होता है कि सिन्धु घाटी सभ्यता का निकटतम सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण से था।
2.  श्री कृष्ण आनर्त्त-देश के शासक थे
      जिस क्षेत्र को सैन्धव-सभ्यता का क्षेत्र कहा जाता है, उसे पुराणों में आनर्त्त-देश कहा गया है। बलरामजी का विवाह जिस रेवती नामक जिस कन्या से हुआ था, उस कन्या के पिता रेवतजी ही उस देश के नरेश थे। रेवती से विवाह के कारण इस राज्य का उत्तराधिकार कृष्ण-बलराम को मिल गया।
      पूर्व में देश की राजधानी का नाम कुशस्थनी था। राजधानी का यह क्षेत्र समुद्र-तल में समा गया था, इसलिए श्रीकृष्ण ने राजधानी का वह क्षेत्र समुद्र से माँगकर वहाँ द्वारका नामक नगरी बसायी—कुशस्थली या तव भूप रम्या/पुरी पराद्भूदमरावतीव। सा द्वारका सम्प्रति तत्र चास्ते/स केशवांशो बलदेवनाम।।(विष्णु पुराण, 4/1/91)।।
3.  श्रीकृष्ण ने नागरी-सभ्यता की स्थापना की
      पुराणों में बताया गया है कि कालयवन के संहार के पूर्व ही भगवान ने द्वारका नगरी बसा ली थी और उग्रसेन समेत सभी यदुवंशियों को आनर्त्त-देश में स्थापित कर दिया था। उन्होंने अपनी राजधानी के लिए समुद्र से जो भूमि मांगी, वह समुद्र-गर्भ में समायी कुशस्थली ही थी। यहाँ उन्होंने नागरी-सभ्यता के अनुरूप न केवल अपनी राजधानी बनायी, बल्कि उसी के समान नागरी-सभ्यता का विस्तार अपने सम्पूर्ण राज्य-क्षेत्र में भी किया। श्रीमद्भागवत में विवरण है कि इसके लिये उन्होंने देवताओं के अभियन्ता विश्वकर्माजी की सेवाएँ लीं। यही कारण है कि समस्त सैन्धव-सभ्यता में नागरी-सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं।
4.  देवी-देवता और उपासना-व्यवस्था
      श्रीकृष्ण स्वयं ही भगवान् विष्णु के साक्षात् अवतार थे। उन्होंने भगवद्गीता में स्वयं को बारम्बार ईश्वर रूप से प्रतिपादित किया है। अर्थात्, वह भगवान विष्णु के जीवित स्वरूप थे। भारतीय संस्कृति की परिपाटी है कि जीवित व्यक्ति की प्रतिमाएँ नहीं लगायी जातीं, इसलिए सैन्धव-सभ्यता में कहीं भगवान विष्णु की प्रतिमा नहीं मिलती।
      जिस श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, ठीक उसी समय उनकी पराशक्ति ने यशोदा के गर्भ से अवतार लिया था। कृष्ण को यशोदा के पास और इस कन्या को कंस के कारागार में पहुँचा दिया गया था। कंस ने इस कन्या को ही देवकी की आठवीं सन्तान मान कर शिला पर पटक कर मारना चाहा तो उसके हाथों से छूटकर वह आकाश की दिशा में ऊपर जाकर देवीरूप से प्रकट हो गईं। उन्होंने कंस को बताया कि दुनिया का तारणहार और तुम्हारा संहारक जन्म ले चुका है। भगवती मनुष्यरूप में स्थित नहीं हुईं। उनके इस स्वरूप की उपासना सम्पूर्ण सैन्धव-सभ्यता में की जाती थी। इसलिए मातृ-शक्तियों की प्रतिमाएं सैन्धव-क्षेत्र में मिलीं।
      भगवान शिव और रुद्र के अनेकानेक रूपों की पूजा-उपासना सम्पूर्ण भारत में सदा से चलती आ रही है। चाहे कश्मीर में अमरनाथ हो या दक्षिण-तट पर रामेश्वरम, चाहे कैलाश पर्वत हो या काशी या उज्जैन।
5.  आनर्त्त-देश (सैन्धव-सभ्यता) का सर्वनाश  
       यदुवंशियों के विनाश की कथा पुराणों में वर्णित है—कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलानृपान्। शापवयाजेन विप्रणामुपसंहृतवान्कुलम्।।(वि.पु. 5/37/3)।। अर्थात् सम्पूर्ण पापी राजाओं (कुछ को स्वयं एवं कुछ का महाभारत युद्ध के म्ध्यम से) संहार  कर के उन्होंने पृथ्वी का भारावतरण किया और फिर ब्राह्मणों के शाप के कारण अपने कुल का भी उपसंहार कर दिया। यादवों की विशाल सेना, उसके सेनापति और सरदार आपस में ही उलझ कर एक दूसरे लड़कर मारे गये।
      फिर जिस दिन श्रीकृष्ण का देहावसान (परलोकगमन) हुआ, समुद्र की बाढ़ से आनर्त्त-देश का सम्पूर्ण क्षेत्र आप्लावित हो गया और द्वारका नगरी भी पुनः समुद्र में डूब गई—प्लावयामास तां शून्यां द्वारकं च महोदधिः।
      यह सम्पूर्ण पौराणिक विवरण एवं सैन्धव-सभ्यता के पुरातात्वि प्रमाण एक दूसरे से मेल खाते हैं। द्वारका-नगरी आज भी गुजरात समुद्र-तट पर है। वैज्ञानिकों ने समुद्र में डूबी द्वारका का भी पता लगा लिया है। सिन्धु नदी के क्षेत्र से लेकर गुजरात आदि का बहुत बड़ा क्षेत्र आनर्त्त-देश की सीमा के अन्तर्गत था। इसी क्षेत्र को आधुनिक इतिहासकारों ने सैन्धव-सभ्यता का नाम दिया है।
      अतएव सुनिश्चित रूप से प्रमाणित होता है कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका-नगरी को केन्द्र बना कर जिस आनर्त्त-साम्राज्य की स्थापना की गई थी, वह वास्तव यादवी-सभ्यता का क्षेत्र था और इसे ही इतिहासकारों ने सैन्धव-सभ्यता का नाम दिया है।
रमाशंकर जमैयारआधुनिक इतिहासकारों के अनुसार भारतीय इतिहास का प्रारम्भ आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले सैन्धव-घाटी सभ्यता की स्थापना से हुआ था। लेकिन, पौराणिक-इतिहास के अनुसार भारतीय इतिहास इतना प्राचीन है कि इसे सनातन भी कहा जा सकता है। आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले तो कलियुग का आरम्भ हुआ था-- यदैव भगवान्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज। वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवात्रागतः कलिः।।(विष्णु-पुराण, 4/24/108)।। कलियुग से पूर्व द्वापर युग था। श्रीकृष्ण और कौरव-पाण्डव आदि द्वापर-कलि के सन्धिकाल के लोग थे। द्वापर से पूर्व त्रेता-काल था और उससे पूर्व सत्युग था। चार युगों की चौकड़ी को चतुर्युग कहा जाता है-कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिश्चैव चतुर्युगम (विष्णु पुराण, 1/3/15)। ऐसे इकहत्तर चतुर्युगों का एक मनव्तर होता है—चतुर्युगाणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः (वि.पु.,1/3/18)। वर्तमान मनवन्तर का नाम वैवस्वत मन्वन्तर है। इस मन्वतर के सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं। अट्ठाईसवाँ चतुर्युग चल रहा है। इस चतुर्युग के तीन युग भी बीत चुके हैं और यह कलियुग चल रहा है। अतः यह कह देना कि भारतीय इतिहास का प्रारम्भ सैन्धव घाटी सभ्यता से हुआ, षड़यन्त्रपूर्वक रचित विकृति है।
      सैन्धव-घाटी सभ्यता की अपनी वास्तविकता है। इसकी स्थापना भगवान श्रीकृष्ण के काल में हुई थी, इसलिए पाँच हजार वर्ष से अधिक पुरानी सभ्यता है। 1922 ईस्वी में हड़प्पा-आदि स्थलों का पुरातात्विक उत्खनन् किया गया था जिससे अनेक पुरातात्विक प्रमाण मिले।
       विदित हो कि यह विदेशी दासता का काल था। 1857 ईस्वी में महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, वीर कुँअर सिंह, मंगल पाँडे सरीखे राजघराने से लेकर अंग्रेजी सेना के सिपाहियों तक ने मिलकर राष्ट्रीय एकता का परचम लहराते हुए प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का युद्ध लड़ा था। भविष्य में ऐसी राष्ट्रीय एकता कभी न बन पाये, इस दृष्टि से अंग्रेजी-सत्ता ने भारतीय संस्कृति और इतिहास को विकृत करने का कार्य अंग्रेजी-सत्ता सम्पोषित इतिहासकारों को दिया।
      इन इतिहासकारों ने उत्खनन् से प्राप्त पुरातात्विक प्रमाणों की वास्तविक व्याख्या इस प्रकार है—
1.  सोलह की संख्या का सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण से
      उत्खनन् से प्राप्त प्रमाणों से ज्ञात हुआ कि इस सभ्यता के लोगों ने 16 की संख्या को इकाई निर्धारण का आधार बना रखा था। 16 आनों का एक रूपया, 16 छटाँक का एक सेर आदि। सोलह की संख्या का यह आधार पिछले पाँच हजार साल से आजादी के बाद भी तबतक चलता रहा जब तक कि भारत की सरकार ने दशमलव-पद्धति नहीं लागू की।
       प्रश्न यह है कि लोगों ने 'सोलह' की संख्या को ऐसा महत्व क्यों दिया? भारतीय इतिहास की वास्तविकता को विकृत करने के लिये ये इतिहासकार इस विन्दु को गोल कर गये हैं। हम इस प्रश्न को पुनः खड़ा करते हैं।
      सोलह की संख्या का सम्बन्ध सीधे-सीधे भगवान श्रीकृष्ण से है। उनका जन्म चन्द्रवंश में हुआ था। कालयवन को अपना परिचय देते हुए श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि वे चन्द्रवंश के अन्तर्गत यदुकुल में वसुदेवजी के पुत्ररूप से उत्पन्न हुए हैं—वसुदेवस्य तनयो यदोर्वंशसमुद्भवः। विदित हो कि महाराज यदु चन्द्रवंशी थे।
      वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु आदि उत्पन्न सन्तान-परम्परा को सूर्यवंश कहा जाता है, जबकि वैवस्वत मनु की पुत्री इला से उत्पन्न सन्तति-परम्परा को चन्द्रवंश कहा जाता है। इला का विवाह चन्द्रमा के पुत्र बुध से हुआ था जिससे पुरुरवा का जन्म हुआ। इसलिए यह राजवंश चन्द्रवंशी कहलाया।
      भगवान श्रीकृष्ण चन्द्रवंशी थे। उन्हें पूर्ण-ब्रह्म का अवतार माना जाता है। चन्द्रमा की सोलह कलाएँ होती हैं, इसलिए कहा जाता है कि श्रीकृष्ण सोलहों कलाओं से पूर्ण थे। इस आधार पर सोलह की संख्या को महत्ता मिली। इससे प्रमाणित होता है कि सिन्धु घाटी सभ्यता का निकटतम सम्बन्ध भगवान श्रीकृष्ण से था।
2.  श्री कृष्ण आनर्त्त-देश के शासक थे
      जिस क्षेत्र को सैन्धव-सभ्यता का क्षेत्र कहा जाता है, उसे पुराणों में आनर्त्त-देश कहा गया है। बलरामजी का विवाह जिस रेवती नामक जिस कन्या से हुआ था, उस कन्या के पिता रेवतजी ही उस देश के नरेश थे। रेवती से विवाह के कारण इस राज्य का उत्तराधिकार कृष्ण-बलराम को मिल गया।
      पूर्व में देश की राजधानी का नाम कुशस्थनी था। राजधानी का यह क्षेत्र समुद्र-तल में समा गया था, इसलिए श्रीकृष्ण ने राजधानी का वह क्षेत्र समुद्र से माँगकर वहाँ द्वारका नामक नगरी बसायी—कुशस्थली या तव भूप रम्या/पुरी पराद्भूदमरावतीव। सा द्वारका सम्प्रति तत्र चास्ते/स केशवांशो बलदेवनाम।।(विष्णु पुराण, 4/1/91)।।
3.  श्रीकृष्ण ने नागरी-सभ्यता की स्थापना की
      पुराणों में बताया गया है कि कालयवन के संहार के पूर्व ही भगवान ने द्वारका नगरी बसा ली थी और उग्रसेन समेत सभी यदुवंशियों को आनर्त्त-देश में स्थापित कर दिया था। उन्होंने अपनी राजधानी के लिए समुद्र से जो भूमि मांगी, वह समुद्र-गर्भ में समायी कुशस्थली ही थी। यहाँ उन्होंने नागरी-सभ्यता के अनुरूप न केवल अपनी राजधानी बनायी, बल्कि उसी के समान नागरी-सभ्यता का विस्तार अपने सम्पूर्ण राज्य-क्षेत्र में भी किया। श्रीमद्भागवत में विवरण है कि इसके लिये उन्होंने देवताओं के अभियन्ता विश्वकर्माजी की सेवाएँ लीं। यही कारण है कि समस्त सैन्धव-सभ्यता में नागरी-सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं।
4.  देवी-देवता और उपासना-व्यवस्था
      श्रीकृष्ण स्वयं ही भगवान् विष्णु के साक्षात् अवतार थे। उन्होंने भगवद्गीता में स्वयं को बारम्बार ईश्वर रूप से प्रतिपादित किया है। अर्थात्, वह भगवान विष्णु के जीवित स्वरूप थे। भारतीय संस्कृति की परिपाटी है कि जीवित व्यक्ति की प्रतिमाएँ नहीं लगायी जातीं, इसलिए सैन्धव-सभ्यता में कहीं भगवान विष्णु की प्रतिमा नहीं मिलती।
      जिस श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, ठीक उसी समय उनकी पराशक्ति ने यशोदा के गर्भ से अवतार लिया था। कृष्ण को यशोदा के पास और इस कन्या को कंस के कारागार में पहुँचा दिया गया था। कंस ने इस कन्या को ही देवकी की आठवीं सन्तान मान कर शिला पर पटक कर मारना चाहा तो उसके हाथों से छूटकर वह आकाश की दिशा में ऊपर जाकर देवीरूप से प्रकट हो गईं। उन्होंने कंस को बताया कि दुनिया का तारणहार और तुम्हारा संहारक जन्म ले चुका है। भगवती मनुष्यरूप में स्थित नहीं हुईं। उनके इस स्वरूप की उपासना सम्पूर्ण सैन्धव-सभ्यता में की जाती थी। इसलिए मातृ-शक्तियों की प्रतिमाएं सैन्धव-क्षेत्र में मिलीं।
      भगवान शिव और रुद्र के अनेकानेक रूपों की पूजा-उपासना सम्पूर्ण भारत में सदा से चलती आ रही है। चाहे कश्मीर में अमरनाथ हो या दक्षिण-तट पर रामेश्वरम, चाहे कैलाश पर्वत हो या काशी या उज्जैन।
5.  आनर्त्त-देश (सैन्धव-सभ्यता) का सर्वनाश  
       यदुवंशियों के विनाश की कथा पुराणों में वर्णित है—कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलानृपान्। शापवयाजेन विप्रणामुपसंहृतवान्कुलम्।।(वि.पु. 5/37/3)।। अर्थात् सम्पूर्ण पापी राजाओं (कुछ को स्वयं एवं कुछ का महाभारत युद्ध के म्ध्यम से) संहार  कर के उन्होंने पृथ्वी का भारावतरण किया और फिर ब्राह्मणों के शाप के कारण अपने कुल का भी उपसंहार कर दिया। यादवों की विशाल सेना, उसके सेनापति और सरदार आपस में ही उलझ कर एक दूसरे लड़कर मारे गये।
      फिर जिस दिन श्रीकृष्ण का देहावसान (परलोकगमन) हुआ, समुद्र की बाढ़ से आनर्त्त-देश का सम्पूर्ण क्षेत्र आप्लावित हो गया और द्वारका नगरी भी पुनः समुद्र में डूब गई—प्लावयामास तां शून्यां द्वारकं च महोदधिः।
      यह सम्पूर्ण पौराणिक विवरण एवं सैन्धव-सभ्यता के पुरातात्वि प्रमाण एक दूसरे से मेल खाते हैं। द्वारका-नगरी आज भी गुजरात समुद्र-तट पर है। वैज्ञानिकों ने समुद्र में डूबी द्वारका का भी पता लगा लिया है। सिन्धु नदी के क्षेत्र से लेकर गुजरात आदि का बहुत बड़ा क्षेत्र आनर्त्त-देश की सीमा के अन्तर्गत था। इसी क्षेत्र को आधुनिक इतिहासकारों ने सैन्धव-सभ्यता का नाम दिया है।
      अतएव सुनिश्चित रूप से प्रमाणित होता है कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका-नगरी को केन्द्र बना कर जिस आनर्त्त-साम्राज्य की स्थापना की गई थी, वह वास्तव यादवी-सभ्यता का क्षेत्र था और इसे ही इतिहासकारों ने सैन्धव-सभ्यता का नाम दिया है।
रमाशंकर जमैयार 

शनिवार, 30 जुलाई 2011

सौन्दर्य और सन्यास


                                        सौन्दर्य और सन्यास  
                 हिन्दी साहित्य में आचार्य चतुरसेन की ख्याति ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखे कई उपन्यासों से है जिनमें तत्कालिन भारतीय समाज की परिस्थितियों का भिन्न-भिन्न पहलुओं का विवरण मिलता है। इनके उपन्यास पर चित्रलेखा नामसे फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म की नायिका  चित्रलेखा का अभिनय मीनाकुमारी ने किया है और सन्यासी कुमारगिरि का अभिनय अशोक कुमार ने। यह कथा भोग (काम) और योग (सन्यास) के परस्पर विपरीत पार्श्वों में झूलती भी है और दोनों में सामंजस्य भी स्थापित करती है।
वह अपने समय की विख्यात राजनर्तकी थी और दरबार की सम्मानित सदस्या। आज जैसे मंत्री-परिषद हुआ करता है, वैसे ही ये दरबार के सदस्य हुआ करते थे। उस समय नारी-जाति से कोई भेदभाव नहीं किया गया जो चित्रलेखा की कथा से प्रमामित होता है।
ये दरबारी अपने-अपने क्षेत्र के उत्कट् विद्वान हुआ करते थे। आम्रपाली नृत्यकला की विदुषी,  अगाध रूप-सौन्दर्य की स्वामिनी थी। साथ ही भारतीय सेक्सोलॉजी की विशारद थी, इसका कोई घृणित अर्थ नहीं निकाला जाए, क्योंकि भारतीय काम-विज्ञान आरम्भ से ही आध्यात्मिक विषय रहा है। इस विषय में प्रवीणता ने उसकी आध्यात्मिक-शक्ति को श्री-सम्पन्न किया था जिसका प्रमाण सन्यासी कुमारगिरि के आगमन से मिलने लगता है।
  सन्यासी कुमारगिरि अपने समय के प्रसिद्ध हठयोगी थे। वे स्त्रियों के स्पर्श से भी बचे रहने का दावा किया करते थे। राजा ने उस तपस्वी को ब्रह्मज्ञान का अधिकारी समझ दरबार में सबसे ऊँचा सम्मान दिया। सन्यासी ने अपने को इस योग्य सिद्ध करने के लिए एक दिन सबके समक्ष भरे दरबार  भगवान को प्रकट दिखाने का दावा किया। राजा और दरबारी विस्मयमुग्ध रह गये, क्योंकि उन्हें लगा कि  सच में उन सबके सामने पीताम्बरधारी श्गरीविष्वाण खड़े हैं। लेकिन, यह तपस्या-बल से अर्जित हिप्टोनिज्म की माया थी, वास्तविकता नहीं। कुमारगिरि की माया आम्रपाली की आँखों को धोखा नहीं दे सकीं। स्सवयं को योगबल के सर्वोच्च अधिकारी मानने वाले कुमारगिरि उस नारी के समक्ष पराजित थे जिसे भोग की स्वामिनी कहकर वे अपमानित करने की चेष्टा कर चुके थे। यहाँ काम-विज्ञान की आध्यात्मिक-शक्ति योग-विज्ञान की शक्ति से प्रतिस्पर्धा लेते हुए स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर रही थी। 
पाश्चात्यवादी विद्वान काम को इन्द्रिय-आधारित संवेग और उत्तेजना मानते हैं, जबकि भारतीय ज्ञान-विज्ञान इसे मन-आधारित शक्ति और आनन्द का स्वरूप मानता है--कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं तदासीत् (नासदीय सूक्त)। इसमें बताया है कि मन की जो बीज-शक्शति है, वह मन के ठीक केन्द्र-विन्दु पर स्थित रहती है और उसी का नाम काम है।
इसलिए, मन को एकाग्र करने से ज्यों-ज्यों मन जाग्रत होता है, उसकी केन्द्र-शक्ति जाग्रत होने लगती है और मन सम्पूर्ण शरीर को जिस आनन्द की अनुभूति कराने लगता है, वह कामानन्द है।  योग-सिद्धि में भी योगी अपने ध्मयान को एकाग्र करता है जिससे उसके मन की चंचलता दूर होती है। विदित हो कि शाँत अर्थात् शुद्ध चित्त के आनन्द को सच्चिदानन्द कहते हैं। यह तो उसी कामानन्द का नाम है। कोई योगी यह कहे कि काम अध्यात्म नहीं भोग है, तो या तो वह अपनी योग-विद्या में अपूर्ण है, या झूठी आत्म-प्रशंषा करता है।   
काम की इन्द्रियजनित अनुभूति और काम की इन्द्रियातीत अनुभूति का अन्तर नहीं समझने वाले कुमारगिरि-जैसे हठयोगी भी होते हैं जो अपने को श्रेष्ठ बताने के लिए स्त्री-शक्ति को काम और भोग का कारक मानकर घृणा फैलाते हैं। स्त्री को कामिनी कहा गया है, इसलिए नहीं कि वह पुरुष को काम-वासना की ओर धकेलती है, बल्कि इसलिए कि उसमें मन को एकाग्र कर उसकी केन्द्र-शक्तिरूप (काम) को जगाने वाली शक्ति है और इस रूप में वह पुरुष के योगबल को मुक्कमल बनाती है।
   सन्यासी को चित्रलेखा चुनौती देते हुए कहती है कि 'जब आप इस संसार में आकर संसार को नहीं पा सकते, फिर ईश्वर को कैसे पायेंगे?' इस संदेश का आधार भी अध्यात्म ही है। विदित हो कि हमारा मन ईश्वर की अनुभूति को भी ग्रहण करने की क्षमता रखता है। उसकी अनुभूति को ब्रह्मानन्द कहा जाता है। इसे शास्त्रों में सच्चिदानन्दघनस्वरूप कहा गया है जिसका अर्थ है सच्चिदानन्द (शुद्धमन के आनन्द) का घनीभूतस्वरूप ((compacted mass)। मन शुद्ध तब रहता है जब उस पर केवल उसकी बीज-शक्ति जागृत रहती है। और यह है काम। इसलिए, कामानन्द का घनभूत स्वरूप ही ब्रह्मानन्द है।  
इसी सन्दर्भ से जुड़े एक अहम प्रश्न का जवाब उपन्यासकार चित्रलेखा के माध्यम से देता है।  काम का इन्द्रिय-सुख एक वासना है जो शरीराकर्षण पर आधारित होता है और इसमें नैतिकता नहीं होती। उसका प्रेमी बीजगुप्त उससे पूछता है--क्या प्रेम पाप है? वह उत्तर देती है कि आत्मा जिसे पाप समझता है, वह पाप है, जिसे पाप नहीं समझता वह पुण्य है। भावार्थ यह है कि शरीर-भोग की इच्छा से किये गये विलास में केवल इन्द्रिय-सुख है, इसे विवेक स्वीकार नहीं करता, इसलिए यह पाप है। लेकिन, प्रेमाकर्षण के बीज मन में होते हैं, इसलिए प्रेमाकर्षण में मिलन विवेकोचित होने के कारण पुण्य है। 
सत्य की पहचान करने की एकमात्र क्षमता विवेकजनित बुद्धि में होती है, क्योंकि विवेक आत्मा की वह शक्ति है जो बुद्धि को सत्य की पहचान से युक्त करती है। इसलिए, विवेकजनित बुद्धि तर्क-वितर्क से परे और निश्चयात्मक होती है--—व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।(गीता,2/41)।। अर्थात् मनुष्य की जो वास्तविक बुद्धि है, वह निश्चयात्मक (व्यवसायात्मिका) होती है--एक और एक होती है (बुद्धिरेकेह), क्योंकि वह सभी विकल्पों से परे रहती है। यहाँ जिस निश्चयात्मक बुद्धि के बारे में श्रीकृष्ण कह रहे हैं, वह 'विवेक' ही है। 
आगे की कहानी में कुमारगिरि वैशाली छोड़कर अपने आश्रम लौट आता है। आम्रपाली कुमारगिरि के सन्यासी जीवन से प्रेरणा लेती है तो उसे मान-सम्मान और भोग-ऐश्वर्य का जीवन व्यर्थ लगने लगता है। वह कुमारगिरि से सन्यास की दीक्षा लेने अकेले और पैदल ही उसके आश्रम की ओर चल पड़ती है। वहाँ पहुँचते-पहुँचते थककर क्लान्त हो जाती है और आश्रम के सामने गिर पड़ती है। कुमारगिरि को विवशता में आम्रपाली-जैसी सुन्दरी को अपनी बाँहों में सम्हालना पड़ता है।
कुमारगिरि का मन भी क्षणमात्र के लिये उस अप्रतिम सौन्दर्य के स्पर्श से रोमांचित हो उठता है, लेकिन वह स्वयं को नियन्त्रित कर लेता है। इस स्पर्श से जिस रोमांच की अनुभूति उसे हुई, वह अप्रत्याशित नहीं, बल्कि स्वाभाविक थी, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है। इसके बावजूद भी उसके विवेक ने इसे निष्पाप अनुभूति के रूप में स्वीकार नहीं किया। कारण स्पष्ट है कि उसने अपने योगहठ के कारण काम को घृणित और त्याज्य समझ रखा था और नारी-शरीर को काम का वास मानता था। उससे शारीरिक पाप भले न हुआ हो, वह मानसिक पाप का शिकार तो हो ही गया। परिणामस्वरूप उसने गंगानदी में शरीर त्याग कर लेने की ठान ली और भगवती गंगा का आह्वान करते हुए नदी की ओर बढ़ने लगा।
आम्रपाली को जब चेतना आई तो वह समझ गई कि कुमारगिरि उसके स्पर्श के कारण आत्मग्लानि से भर चुका है। वह जानती थी कि उसने कोई पाप नहीं किया है, फिर भी कुमारगिरि की स्थिति के लिए उसने स्वयं को जिम्मेवार माना। वह भी शरीर त्याग की नीयत से गंगा नदी की ओर बढ़ी। गंगा नदी उफनती-दौड़ती उनकी ओर बढ़ रही थी। कुमारगिरि आगे-आगे थे, लेकिन गंगा उसे अपनी जलधारा में लेती, एक सर्प ने उसे डँस लिया। कुमारगिरि और आम्रपाली दोनों को ही गंगा की धारा बहा कर ले गई, लेकिन इसके पूर्व ही कुमारगिरि की मौत सर्प-दंश से हो चुकी थी। यह भोग की स्वामिनी के आगे योग के स्वामी की पराजय थी। इसप्रकार, यदि काम और योग को एक ही तराजू पर रखा जाए, तो भी काम को कमतर सिद्ध करना असम्भव-सा है।
यह प्रसंग विवेक का महत्व समझ में आता है। विवेक की आवश्यकता न केवल भोग के लिए है, बल्कि योग के लिए भी। विवेकहीन योग अहंकार का कारण हो जाता है। यह अहंकार ही घृणा को जन्म देता है। नारी को शरीर को भोग का वास मान लेना एक योगी का अहंकार है, क्योंकि नारी एक शक्ति है, भोग की वस्तु नहीं। यह शक्ति सत्यात्मक है, क्योंकि उसके रूप-सौन्दर्य में आनन्ददायक आकर्षण है। सत्यम् शिवम् सुन्दरं का वैदिक सिद्धान्त बताता है कि जहाँ आनन्द है, वहीं सुन्दरता का आभास है। आनन्द की स्थिति वहीं है जहाँ कल्याण (शिवम्) है। कल्याण वहीं है, जहाँ सत्य है। इसलिए, नारी-शक्ति में सत्य अन्तर्निहित है, क्ल्याण अन्तर्निहित है, इसलिए वह सुन्दर प्रतीत होती है। इससे घृणा करना योगबल और ज्ञान का अपमान है। 
रमाशंकर जमैयार,
वीरपुर, सुपौल, बिहार।