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बुधवार, 17 अगस्त 2011

विश्वामित्र और मेनका-एक विश्लेषणात्मक अध्ययन


ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका
भारतीय अध्यात्म नारी को भोग्या नहीं, शक्तिरूप बताता है, चाहे वह प्रेमिका हो या पत्नी।
भारत के ऐतिहासिक गाथाओं में चाहे उसे आधुनिक काल के उपन्यासकार आचार्य चतुरसेन ने लिखा हो या पुराणकारों ने, पत्नी या प्रेमिका के रूप में नारी का चित्रण भोग्या के रूप में नहीं, बल्कि 'शक्ति-स्वरूपा' के रूप में किया गया है। आचार्य चतुरसेन के चित्रलेखा एवं आम्रपाली उपन्यासों में भी यही दीखता है। ये नायिकाएँ अपने समय के महान् योगियों के समकक्ष ही नहीं, कभी-कभी उनसे श्रेष्ठ दिखाई देती हैं। उनके रूप-सौन्दर्य और भोग-वैभव में भोगवादी कालिमा नहीं, आध्यात्मिक चाँदनी बिखरी मिलती है। इसके विपरीत सीजर और क्लियोपेट्रा की यूरोपियन गाथाओं में नारी की शारीरिक मादकता और भोग्या का स्वरूप झलकता है जिसका उपयोग वह अपने लाभ के लिए करती है।
पाश्चात्य संस्कृति शारीरिक आधार पर सेक्स की पहचान शारीरिक भूख के रूप में करती है। इसके ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति इस सिद्धान्त को सिरे से नकारती है। उसके पास आधार है वैदिक विज्ञान का जिसमें शरीर और आत्मा की प्रकृति का वैज्ञानिक विवरण शामिल है। इस विषय पर हम ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की प्रेम-गाथा के माध्यम से विवकण प्रस्तुत करना चाहेंगे।
आधुनिक इतिहासकारों ने पुराणों से चक्रवर्त्ती सम्राट भरत का प्रसंग उठाया है और बताया है कि इन्हीं के नाम पर इस देश का नाम 'भारत' पड़ा। इनके पिता पुरुवंशी राजा दुष्यन्त थे और माता थीं शकुन्तला। इसलिए, शकुन्तला का सम्बन्ध  भारतीय इतिहास से है। पुराणों में बताया गया है कि महाराज दुष्यन्त ने शकुन्तला की रूप-कान्ति पर रीझकर उनसे प्रेमविवाह किया था। वह मेनका नामक अप्सरा की पुत्री थीं, इसलिए स्वाभाविकरूप से परम सुन्दरी थीं। उनकी पहली मुलाकात वनों में स्थित कण्व ऋषि के आश्रम के निकट हुआ था। परिचय पूछने पर शकुन्तला ने उन्हें बताया कि वह विश्वामित्रजी की पुत्री है और उसकी माता मेनका ने उन्हें यहाँ (ऋषि आश्रम) में छोड़ रखा है—विश्वामित्रात्मजैवाहं त्यक्ता मेनकया वने (श्रीमद्भागवद, 9/20/13)।
इसप्रकार, ऋषि विश्वामित्र और मेनकाimages (3).jpg का सम्बन्ध भी भारतीय इतिहास से है।

भारत को लोग विश्वामित्र को एक 'ऋषि' के रूप में जानते हैं। वैदिक विज्ञान में ऋषि शब्द का विशेष अर्थ है। पहली बात तो यह कि उन्हें ही वैदिक-ऋचाओं का 'द्रष्टा' माना जाता है और दूसरी बात यह कि उन्हें 'अमर' बताया जाता है। विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने आरम्भ में नौ मानस-पुत्रों को उत्पन्न किया--अथान्यान्मानसान्पुत्रान्सदृशानात्मनोऽसृजतम (वि.पु.,1/7/4)। इनमें वशिष्ठ, भृगु, अत्रि आदि के नाम पौराणिक आख्यानों में बराबर आते हैं। ये ब्रह्मा के पुत्र होने के कारण अमर थे।
परन्तु, विश्वामित्र इनसे भिन्न थे। उनका जन्म मानव-वंश में हुआ था। वे जाह्नु-वंश के सम्राट कुशाम्ब के पौत्र और गाधि के पुत्र थे। बाद में उन्होंने अपने पिता के राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त कर वीर क्षत्रिय की भाँति राज्य भी किया। विवाहकर पुत्रादि भी उत्पन्न किये।
फिर भी, विश्वामित्र की गणना पूर्वोक्त अमर ऋषियों की श्रेणी में की जाती है। इन्हें उन सप्तर्षियों में से एक माना गया है जो ध्रुव-तारे की परिक्रमा करने वाले सप्तर्षि संज्ञक तारामंडल के अधिपति हैं—वसिष्ठः काश्यपोऽथात्रिर्जमदग्निस्सगौतमः। विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन।।(विष्णु पुराण, 3/1/32)।। तात्पर्य यह है कि वे मानव-जाति के उन विभूतियों में से है जिन्होंने मनुष्य-योनि में जन्म लेकर भी अमरत्व और ऋषित्व प्राप्त किया।
अमरत्व और ऋषित्व प्राप्त करने वाले विश्वामित्र निश्चय ही महान तपस्वी एवं सिद्ध-योगी थे। तपस्या के क्रम में ही उनकी मुलाकात अप्सरा मेनका से हुई। फिर, मेनका की याचना पर उन्होंने उसे सन्तान-सुख प्रदान किया जिसके फलस्वरूप शकुन्तला का जन्म हुआ।
भारतीय संस्कृति में जहाँ अप्सराओं को स्त्री-सौन्दर्य का सबसे सुन्दर रूप माना जाता है, वहीं अन्यान्य संस्कृतियों के ग्रन्थों में भी परियों की कहानी आती है और इन्हें भी स्त्री-सौन्दर्य का सबसे सुन्दर रूप माना गया है। इन्हें मनुष्य-लोक से भिन्न परीलोक का निवासी माना गया है। हातिमताई की कहानियों में ऐसी कुछ परियों की चर्चा है। कुछ लोग इन कहानियों को गल्प-कथा मानते हैं। लेकिन, वैज्ञानिकों को उड़न-तश्तिरयों और एलियन्स के प्रमाण मिल चुके हैं और यह स्वीकार किया जा चुका है कि एलियन्स (परलोकवासी) भी हैं जिनका विज्ञान हमारे विज्ञान से बहुत आगे है।
भारतीय ग्रन्थों में अप्सराओं को देवराज इन्द्र के स्वर्गलोक का निवासी बताया गया है और उन्हें देवराज इन्द्र के अधीन माना गया है। कहा जाता है कि देवराज इन्द्र द्वारा उनका उपयोग कई बार तपस्वियों की तपस्या को भंग करने के लिये भी किया जाता है, क्योंकि उनके रूप-सौन्दर्य का आकर्षण अत्यन्त प्रबल होता है—धरती की नारियों की तुलना में बहुत ही अधिक। ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या इन्द्र ने मेनका को भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने को भेजा था?
इस सम्बन्ध में स्पष्टरूप से कहा जा सकता है कि इन्द्र को विश्वामित्र से किसी प्रकार की ईष्या नहीं थी, क्योंकि वे तो स्वयं देवराज इन्द्र के पुत्र थे। इस सम्बन्ध में विष्णु पुराण में बताया गया है कि विश्वामित्रजी के पितामह .कुशाम्ब की इच्छा थी कि उसका इन्द्र के सामान प्रतापी एक पुत्र उत्पन्न हो। इस निमित्त उसने घोर तप किया—तेषां कुशाम्बः शक्रतुल्यो मे पुत्रो भवेदिति तपश्चकार (वि.पु., 4/7/9)। देवराज को भय हुआ कि कुशाम्ब के पुत्ररूप से कहीं कोई दूसरा इन्द्र न उत्पन्न हो जाए, इसलिए स्वयं इन्द्र ही उसके पुत्ररूप से अवतरित हो गये और गाधि के नाम से जाने गये जो विश्वामित्र के पिता थे।
अतः, देवराज इन्द्र प्रकारान्तर से विश्वामित्रजी के पिता थे। वे उनकी तपस्या की सिद्धि चाहते थे। इसलिये उन्होंने  योगसिद्धि में उनकी सहायिका बनाकर उनके पास भेजा।
हर सामान्य व्यक्ति स्त्री के रूप-सौन्दर्य को भोग की वस्तु तो मान सकता है, लेकिन तपस्या में सिद्धि का कारक मानने को तैयार नहीं होगा। परन्तु, योग और अध्यात्म के विज्ञान में स्त्री को सिद्धि का कारक बताया गया है—
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण जीवात्मा के सम्बन्ध में कहते हैं—सर्वयोनिषु कौन्तेय मूत्तर्यः सम्भवन्ति या। तासां ब्रह्म मह्द्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।(14/4)।। वे अर्जुन से कहते हैं-हे अर्जुन (कौन्तेय)! प्रत्येक योनि की जो वाह्याकृति (मूर्त्ति) होती है (सम्भवन्ति वा)। वह महद्-ब्रह्म (ब्रह्म महद्) का बलात्मक घेरा है (जिसे पराशक्ति या माया के नाम से भी जाना जाता है।  उस वाह्याकृति (वाह्य-परिच्छेद) की बीज-शक्तिरूप से (बीजप्रदः) मैं (अहं) स्वयं स्थित हूँ, इसलिए सबका पिता हूँ।
विदित हो कि बीजशक्ति का अर्थ है केन्द्र-शक्ति। अर्थात् केन्द्र पर स्थित विन्दुरूप शक्ति। श्रीकृष्ण बताते हैं कि जीवात्मा के केन्द्र पर परब्रह्म विन्दुरूप नित्य शक्ति है। इसे प्रजापति भी कहते हैं। जीवात्मा के ही सन्दर्भ में बृहदारण्यकोपनिषद (5/9/1) में बताया गया है कि यह विन्दुरूप 'ब्रह्म' अकेला नहीं रहना चाहता ( स नैव रेमे तस्मादेकाकी)। एक से दो होने की इच्छा से (स द्वितीयमैच्छत्) वह चने की दाल की तरह आधा-आधा होकर दो भागों में विभाजित हो जाता है। इनमें से एक स्त्रीरूप है और दूसरा पुरुषरूप (स्त्रीपुमांसौ संपरिष्वक्तौ)। यह स्त्रीरूपा-भाग ही योग-शास्त्रों में कुण्डलिनी-शक्ति के नाम से प्रसिद्ध है और पुरुषरूप-भाग को सदाशिव नाम से जाना जाता है। ये दोनों एक ही शक्ति के दो स्वरूप हैं, परस्पर पति-पत्नी रूप हैं, इसलिए इन दोनों में घोर आकर्षण रहता है। इन दोनों को परस्पर मिलने से बाधित करने के लिए ही मानव-योनि में षटचक्रों की व्यवस्था है। षटचक्रों में सबसे नीचे मूलाधार चक्र है जो कुण्डलिनी-शक्ति का स्थान है और सबसे ऊपर सहस्रार चक्र है जो सदाशिव का स्थान है।
यह स्थिति स्त्री और पुरुष, दोनों में ही समानरूप से रहती है। फिर भी, दोनों में स्पष्ट अन्तर यह है कि स्त्री कुण्डलिनी-प्रधाना होती है और पुरुष सदाशिव-प्रधान होता है। हम यह समझते हैं कि पुरुष के शरीर को देखकर स्त्री और स्त्री के शरीर को देखकर पुरुष आकर्षित होता है, लेकिन यह वाह्य-भ्रम भर है। यहाँ तो पुरुष का सदाशिव स्त्री की कुण्डलिनी-शक्ति के प्रति तथा स्त्री की कुण्डलिनी-शक्ति पुरुष के सदाशिव के प्रति आसक्ति व्यक्त करता है।
योग-साधना में कुण्डलिनी-शक्ति को जाग्रत किया जाता है। इससे वह एक-एक कर ऊपर के चक्रों का भेदन करते (पार करते) हुए सहस्रार-चक्र स्थित सदाशिव से जा मिलती है और उसके साथ संयुक्त हो जाती है। फिर वे दोनों हृद्य-स्थित अनहद-चक्र पर आकर स्थित हो जाते हैं। यही योग की पूर्णता है। इसी स्थिति को मोक्ष कहा जाता है। यहाँ ब्रह्म अपने पूर्ण-स्वरूप में स्थित रहता है, इसलिए इस स्थिति का योग-विद्या द्वारा व्यावहारिक ज्ञान ही ब्रह्म-ज्ञान है।
विश्वामित्र और अप्सरा मेनका
विश्वामित्रजी ब्रह्म-ज्ञान अर्थात् मोक्ष-प्राप्ति की ही साधना कर रहे थे। इसमें पहले ध्यान को एकाग्र कर मन की चंचलता को दूर किया जाता है, क्योंकि चंचलता-विहीन स्थिति मे ही मन योग का साधन बन पाता है। वह कुण्डलिनी-शक्ति-के गिर्द भ्रमर की तरह उसके चारों ओर घूमने लगता है जिससे कुण्डलिनी-शक्ति जाग्रत होने लगती है। विश्वामित्र जी को इस स्थिति तक पहुँचने में ही बाधा हो रही थी। वे क्षत्रिय-वंश के थे, इसलिए उनमें क्रोध अधिक था।
ऐसे समय में उन्हें एक ऐसी वाह्य-शक्ति की आवश्यकता थी जो एक झटके से उनके ध्यान को एकग्र कर उनके मन की चंचलता भी दूर कर दे और साथ ही साथ उनकी कुण्डलिनी-शक्ति को भी जाग्रत कर दे। ये दोनों ही शक्तियाँ नारी-सौन्दर्य में है। यह व्यावहारिक तथ्य है कि कोई सुन्दरी जब समक्ष आ जाती है तो आँखें उसी पर जम जाती हैं। केवल आँखें ही नहीं, पूरा ध्यान ही उस पर एकाग्र हो जाता है। ध्यान की एकाग्रता का आलम यह होता है कि कभी-कभी आस-पास के माहौल का भान भी नहीं रहता।
मेनका स्वर्ग की अप्सरा थी, किसी भी मानवी की तुलना में उसके रूप-सौन्दर्य का आकर्षण प्रबलततर था। इसके कारण विश्वामित्र को उसके रूप-सौन्दर्य के ध्यान से ही एकाग्रता की प्राप्ति हो गई—मन एकाग्र हो गया। नारी होने के कारण वह कुण्डलिनी-प्रधाना थी और अप्सरा होने के कारण इसरूप में भी प्रबलतम थी। फलस्वरूप, विश्वामित्रजी शीघ्र ही न केवल ध्यानस्थ हो पाये, बल्कि अपनी कुण्डलिनी-शक्ति को भी जाग्रत कर पाये। फलस्वरूप उन्हें शीघ्र ही कुण्डलिनी-शक्ति और सदाशिव के अनहद-चक्र पर स्थित होने का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो गया और उनके योग की सिद्धि हो गई।
इनकी योग-सिद्धि में सहायिका बनी मेनका ने विश्वामित्रजी का आध्यात्मिक उपकार किया था। इसके एवज में वह उनसे कुछ भी मांग पाने के योग्य थी। उसने विश्वामित्र को निरन्तर अपनी स्मृति में बनाये रखने के लिए उनसे सन्तान की मांग की। इससे मेनका ने शकुन्तला को पुत्रीरूप से जन्म दिया।
रमाशंकर जमैयार

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

जात-पाँत पूछे नहीं कोय



संत रविदास अपने समय के श्रेष्ठतम संतों में एक थे। वे माने हुए संत थे, परन्तु जाति से चमार थे। फिर भी, समाज में उनकी एवं उनके उपदेशों की विशेष महत्ता थी। वे ज्ञानी थे ही, भाषा में भी निपुण थे। उन्होंने दोहों-पदों के रूप में अपने उपदेशों को व्यक्त किया है। उनके अनेक पदों को गुरुग्रन्थ साहब में भी शामिल किया गया है। उन्होंने सामाजिक भेदभाव को कभी भी धर्मसंगत नहीं माना और न इसके लिए कभी धार्मिक ग्रन्थों को दोषी बताया। वे कहते हैं---‘जात पाँत पूछै नहीं कोय, हरि को भजै सो हरि का होय।’
कई लोग यह अनुमान करते हैं कि जाति के आधार पर रविदासजी को भी अपमान के घूँट सहने पड़े थे, क्योंकि उनके काल में जात-पाँत का भेद बहुत ही बढ़ा हुआ था। इसलिए उन्हें ऐसा उपदेश देना पड़ा। परन्यतु, यह सही नहीं है। यह तो ऋणात्मक सोच और विपरीत बुद्धि की उपज है जिसके आधार पर    इतिहास की वास्तविकता को विकृत किया जाता हैं।
      मुस्लिम-काल के भारतीय संतों का अपना गौरवशाली इतिहास है। संतों की इस परम्परा में गुरु नानक, रविदास, कबीरदास और मीराबाई का नाम अग्रगण्य है। गुरु नानक, रविदास और कबीर दास के गुरु थे रामानन्दजी जो ब्राह्मणवंशी थे। उस समय यदि जातिभेद प्रबल होता तो एक ब्राह्मण गुरु रविदास जैसे चमार और कबीरदास जैसे जुलाहे को अपना शिष्य क्यों बनाता गुरु नानक क्षत्रियवशी थे। उन्होंने स्वयं को भगवान राम का वंशज बताया है, फिर भी रविदास के पदों को गुरुग्रन्थ साहब में शामिल किया गया है। इतना ही नहीं, राजवंश की मीराबाई को गुरु स्वयं संत रविदास थे। इतने महान संत होते हुए भी रविदासजी ने चर्मकारी के वंशानुगत पेशे का त्याग नहीं किया, क्योंकि यह पेशा कभी भी उनकी परेशानी का सबब नहीं बना। उनका निम्नांकित दोहा उनके पेशे से सम्बन्धित है, फिर भी पवित्रता का द्योतक हैमन चंगा तो कठौती में गंगा। कोई स्त्री गंगास्नान को गई थी। वहाँ उसका एक कंगन हाथ से निकलकर गंगाजी में चला गया। वह रोती हुई घर लौट रही थी। रास्ते में रविदास जी बैठे अपने पेशे में लगे थे। उनके काठ की कठौती में चमड़ा धोने के लिये पानी रखा हुआ था। वह स्त्री इस महान संत के सम्मुख आकर अपनी व्यथा सुनाने लगी। रविदासजी ने कठौती में गंगा माता का आह्वान किया और उस कठौती से उस महिला का कंगन निकल आया।  घटना ने मन चंगा तो कठौती में गंगा की उक्ति को प्रमाणित किया। यह घटना यह भी प्रमाणित करता है कि रविदासजी एक सिद्ध संत थे। उन्होंने अपने ही चरित्र से प्रमाणित किया कि जो ईश्वर को भजता है, वही ईश्वर का होता है चाहे वह शूद्रादि जाति का ही क्यों न हो!    
      भारतीय संस्कृति ईश्वरवाद पर आधारित है। जो ईश्वर और उसकी सत्ता को नहीं मानता, उसे नास्तिक कहा जाता है। भारतीय संस्कृति ने सदैव ही नास्तिकता का विरोध किया है। कुछ पंडित-विद्वान ऐसे भी हैं जो स्वयं को धर्मशास्त्री बताते हैं, लेकिन नास्तिकता का प्रचार करते हैं। मुझे स्मरण है कि जब बूटा सिंह केन्द्र सरकार में गृहमंत्री थे, तब एकबार वे जगन्नाथपुरी आये थे, भगवान का दर्शन करने। उनके जाने के बाद मंदिर-प्रांगण को गंगाजल से धोकर शुद्ध किया गया। ऐसी शुद्धि को धर्म का आधार दिया गया। क्या वास्तव में धर्म विभेदात्मक अस्पृश्यता की प्रेरणा देता हैं, लोगों में घृणा के भाव फैलाता है धर्म शब्द की उत्पत्ति धृति से हुई है जिसका अर्थ है धारण करने योग्य। इसलिए, धर्म मनुष्य को जीवन की कला सिखाता है, घृणा और अपमान के पाठ नहीं पढ़ाता।
छुआछूत के सिद्धान्त में निहित नास्तिकता
. ईश्वर सर्वशक्तिमान है
      धर्म का पहला पाठ है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है। धनात्मक और ऋणात्मक भेद से शक्ति के दो प्रकार होते हैंकल्याणकारी (दिव्य) और अकल्याणकारी (आसुरी यानि शैतानी)। ईश्वर की शक्ति इन दोनों ही प्रकार की शक्तियों से ऊपर होती है, इसलिए वह सर्वशक्तिमान कहा जाता है। ईश्वर यदि सर्वशक्तिमान है तो किसी शूद्र के स्पर्श से वह स्वयं अपवित्र कैसे हो सकता है यदि वह किसी शूद्र के स्पर्श से इस प्रकार अपवित्र हो जाता है कि गंगाजल से धोये बिना उसकी शुद्धि सम्भव नहीं, तो निश्चय ही ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। लेकिन, जो लोग उसे सर्वशक्तिमान नहीं मानते, वे घोर नास्तिक हैं।
. ईश्वर अघहारी है
      महात्मा गाँधी का प्रिय भजन हैरघुपति राघव राजा राम। पतित पावन सीता राम। इसमें ईश्वर को पतित पावन कहा गया है। बिन्दू कवि कहते हैंअघहारी हरि दुखिया जन के दुख-क्लेश हरेंगे कभी न कभी। यहाँ ईश्वर को अघ (पाप) का नाश करने वाला बताया गया है। बिन्दू कवि के कथन का अभिप्राय है कि कोई व्यक्ति यदि पापयुक्त हो गया है, फिर भी वह भगवान की शरण में चला जाता है तो भगवान उसका पाप हर लेते हैं और उसे निष्पाप बना देते हैंपतित से पावन बना देते हैं। मनुष्य की कोई बीमारी होती है तो वह डाक्टर के पास जाता है। डाक्टर उपचार के माध्यम से उसकी बीमारी दूर कर देता है। प्रश्न यह है कि जिस मनुष्य को पाप की बिमारी लग गई है-जिसका पतन हो चुका है, उसका ईलाज कौन करेगा इस प्रश्न का उत्तर यह है कि पाप की बीमारी को दूर करने वाला यदि कोई डॉक्टर है, तो वह स्वयं ईश्वर है। ईश्वर की तुलना हम पारस-मणि से कर सकते हैं जिसके स्पर्श-मात्र से लोहा भी सोना हो जाता है। अब यदि पारस मणि लोहे को स्पर्श से स्वयं शक्तिहीन हो जाए तो वह कैसा पारस-मणिॽ
३. शुद्धि-मंत्र
      उपरोक्त जवाब का आधार धार्मिक ग्रन्थ स्वयं हैं। कर्म-काण्ड में ‘शुद्ध मंत्र’ का व्यापक स्थान है। हाथ में जल लेकर शुद्धि मंत्र का उच्चारण किया जाता है और वह जल देह पर छिड़क कर शुद्ध हो जाने का अहसास किया जाता है। पूजनादि कार्यों में हम सभी इस मंत्र का पाठ या अनुश्रवण करते हैं, परन्तु मंत्र के अर्थ और कथ्य पर विचार नहीं करते। मंत्र इस प्रकार हैॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं, वाह्याभ्यान्तरः शुचिः।। लोग दो प्रकार के होते हैंपवित्र और अपवित्र। अवस्थाएँ भी दो प्रकार की होती हैशौचावस्था और अशौचावस्था। शौचावस्था में व्यक्ति अपवित्र माना जाता है और अशौचावस्था वह है जब जलादि छिड़ककर वह पवित्र हो जाता है। इस व्याख्या के अनुरूप मन्त्र का अर्थ इस प्रकार हैकोई व्यक्ति चाहे अपवित्र हो या पवित्र (अपवित्रः पवित्रो वा), अशौचावस्था में हो या शौचावस्था में (सर्वावस्था गतोऽपि वा), जैस ही वह भगवान विष्णु (ईश्वर) का स्मरण करता है (यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं), वह बाहर और भीतर से (तन और मन दोनों से) पवित्र हो जाता है (वाह्याभ्यान्तरः शुचिः)।
      इस शुद्धि मन्त्र से स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर के स्मरण मात्र से ही मनुष्य पतित से पावन हो जाता है। कोई व्यक्ति यदि मन्दिर जा रहा है तो निश्चय ही उसे ईश्वर का स्मरण हो आया है। इसकारण वह पतित से पवित्र हो चुका है। फिर भी, हम उसकी जाति पूछते हैं और यदि वह जाति का शूद्र हुआ तो उसे मन्दिर में प्रवेश करने से रोक देते हैं। किसी व्यक्ति को ईश्वर की उपासने करने से रोकने के लिये जब हम उसका मन्दिर में प्रवेश ही रोकते हैं, तो अनुमान कीजिये कि हम कितने बड़े असुर हैं जो भक्त के अधिकार का भी शमन करते हैं और ईश्वर के अधिकार का भी। यदि पतित को पावन बनाने की शक्ति ईश्वर में है तो पतित को पावन बनाने का भी अधिकार ईश्वर को ही है। किसी भक्त को रोकने का अर्थ है कि हम ईश्वर का अपमान कर रहे हैं, उसके अधिकार में बाधा पहुँचा रहे हैं। इसी प्रकार, कोई व्यक्ति ‘पतित’ है तो उसके इस रोग का ईलाज ईश्वर के पास ही है, इसलिए उसे ईश्वर के पास जाने का अधिकार है। किसी रोगी को उसके डाक्टर के पास जाने नहीं दिया जाय तो यह कितना अमानवीय कार्य होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।
५.वर्ण-व्यवस्था
      यह सही है कि पुराणों के अनुसार ब्रह्माजी ने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्र को उत्पन्न किया--ब्रह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम। पादोरुवक्षःस्थलतो मुखतश्च समुद्गताः।।(वि.पु. //)।। इस तर्क के आधार पर यह धारणा बना लेना कि ब्रह्माजी ने मनुष्य को इन चार वर्गों में विभाजित कर उत्पन्न किया है, अज्ञानात्मक तर्क है, क्योंकि उन से उत्पन्न ये चारों मनुष्य नहीं, वर्ण हैं--सर्वाश्चातुवर्ण्यमिदं ततः (//)।
      वर्ण और मनुष्य में भिन्नता है। वर्ण शब्द का अर्थ है रंग, इसलिए यह गुणबोधक है। अर्थात् यह समझा जाना चाहिए कि वर्णों के रूप में मनुष्य के चार गुणों (प्रवित्तियों) की उत्पत्ति हुई। मनुष्य की ज्ञानात्मक प्रवृत्ति को ब्राह्मण-वर्ण, रक्षात्मक प्रवृत्ति को क्षत्रिय-वर्ण, आर्थिक प्रवृत्ति को वैश्य-वर्ण और सेवाभाव की प्रवृत्ति को शूद्र-वर्ण की संज्ञा दी गई है।
       पुराणों का निश्चित कथन है कि मनुष्य की उत्पत्ति मनु से हुई। पुराणकार बताता है कि ब्रहामाजी ने मनुष्य के आदिपूर्वज के रूप में जिस मानव-बीज रूप प्राणी को उत्पन्न किया वह स्वायम्भुव मनु नाम से प्रसिद्ध है--तो ब्रह्माऽऽत्मसम्भूतं पूर्वं स्वायम्भुवं प्रभुः। आत्मानमेव कृतवान्प्रजापाल्ये मनुं द्विज।।(वि.पु. //१६)।। विदित हो कि मनु की संतति-परम्परा को ही मनुष्य (मनुज) कहा जाता है।
      अतः, वंशानुगत आधार पर मनुष्य को चार वर्गों में विभाजित करने की धारणा पौराणिक सिद्धान्तों के विपरीत है। यह विभेद तो उन लोगों का किया-कराया है जिन्होंने भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनायी।
रमाशंकर जमैयार